जन्मजात मोतियाबिंद (Congenital Cataract): जब नवजात की आंखों में भी धुंधलापन आ सकता है

"मोतियाबिंद तो बुढ़ापे की बीमारी है" — यह सोच ज्यादातर लोगों के दिमाग में गहरी बैठी हुई है। इसीलिए जब किसी नवजात शिशु की आंख में मोतियाबिंद निकलता है, तो माता-पिता के लिए यह खबर किसी झटके से कम नहीं होती। सवाल उठता है — भला एक हफ्ते या एक महीने के बच्चे को मोतियाबिंद कैसे हो सकता है?

सच यह है कि यह होता है, और इसे मेडिकल भाषा में congenital cataract यानी जन्मजात मोतियाबिंद कहा जाता है। यह उतना आम नहीं है जितना बड़ों वाला मोतियाबिंद, लेकिन जब होता है तो समय पर पकड़ में आना और सही उम्र में इलाज होना बहुत मायने रखता है — क्योंकि बच्चे की आंखों का विकास जीवन के शुरुआती महीनों में ही सबसे तेजी से होता है।

इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि जन्मजात मोतियाबिंद असल में है क्या, यह क्यों होता है, इसे कैसे पहचानें, और अगर डॉक्टर सर्जरी की सलाह दें तो आगे का रास्ता कैसा होता है।

जन्मजात मोतियाबिंद आखिर है क्या

हमारी आंख में एक प्राकृतिक लेंस होता है, जो कांच की तरह पारदर्शी होता है। यही लेंस बाहर से आने वाली रोशनी को मोड़कर रेटिना (आंख के पिछले हिस्से) पर केंद्रित करता है, जिससे हमें साफ तस्वीर दिखाई देती है। जब किसी वजह से यह लेंस धुंधला या बादलों जैसा हो जाता है, तो उसे मोतियाबिंद कहा जाता है।

आमतौर पर यह उम्र के साथ प्रोटीन के जमाव से होता है, इसीलिए इसे बुजुर्गों की समस्या माना जाता है। लेकिन कुछ बच्चे इस धुंधलेपन के साथ ही जन्म लेते हैं, या यह जन्म के कुछ ही हफ्तों-महीनों के भीतर विकसित हो जाता है। यही स्थिति congenital cataract कहलाती है।

यह एक आंख में भी हो सकता है (unilateral) और दोनों आंखों में भी (bilateral)। दोनों आंखों वाले मामलों में अक्सर कोई अंतर्निहित (genetic या systemic) कारण मिल जाता है, जबकि एक आंख वाले मामलों में अधिकतर बच्चा बाकी सब मायनों में पूरी तरह स्वस्थ होता है।

कितना आम है यह — क्या यह सच में दुर्लभ है

आंकड़ों की बात करें तो दुनियाभर में हर 10,000 जीवित जन्मे बच्चों में लगभग 1 से 15 बच्चों में जन्मजात मोतियाबिंद पाया जाता है — यह आंकड़ा देश और आबादी के हिसाब से थोड़ा ऊपर-नीचे होता रहता है। यह सुनने में भले ही छोटी संख्या लगे, लेकिन बच्चों में होने वाले अंधेपन के मामलों में यह एक प्रमुख और इलाज योग्य कारण है — खासकर उन देशों में जहां शुरुआती जांच और सर्जरी की सुविधा तक पहुंच सीमित है।

यही वजह है कि नवजात शिशुओं की आंखों की जांच (खासकर जन्म के 72 घंटों के भीतर की red reflex जांच) को इतना जरूरी माना जाता है — क्योंकि जितनी जल्दी पकड़ में आए, नतीजे उतने ही बेहतर होते हैं।

जन्मजात मोतियाबिंद होता क्यों है

बहुत से माता-पिता सबसे पहले यही पूछते हैं — "हमसे कहां चूक हुई?" सच यह है कि ज्यादातर मामलों में इसका सीधा जवाब किसी की "गलती" नहीं होता। कारण कई तरह के हो सकते हैं:

  • आनुवंशिक कारण — परिवार में पहले से मोतियाबिंद का इतिहास हो तो जोखिम बढ़ जाता है। अध्ययनों के अनुसार लगभग एक-चौथाई मामले वंशानुगत पाए गए हैं।
  • गर्भावस्था के दौरान संक्रमण — जैसे रूबेला (जर्मन खसरा), टॉक्सोप्लाज्मोसिस, हर्पीज़ या साइटोमेगालोवायरस जैसे संक्रमण अगर गर्भावस्था में मां को हों, तो भ्रूण की आंख के लेंस पर असर डाल सकते हैं।
  • मेटाबॉलिक (चयापचय) संबंधी विकार — जैसे गैलेक्टोसीमिया, जिसमें शरीर एक खास शुगर को ठीक से पचा नहीं पाता।
  • क्रोमोसोमल असामान्यताएं — डाउन सिंड्रोम जैसी स्थितियों में भी जन्मजात मोतियाबिंद देखा जा सकता है।
  • मधुमेह (डायबिटीज़) — मां को गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज़ हो, तो यह भी एक जोखिम कारक बनता है।
  • आघात (Trauma) या सूजन — कभी-कभी आंख को लगी चोट या आंतरिक सूजन भी वजह बन सकती है।
  • कुछ दवाओं की प्रतिक्रिया — गर्भावस्था के दौरान ली गई कुछ दवाएं भी असर डाल सकती हैं।

और हां — बहुत से मामलों में, खासकर जब सिर्फ एक आंख प्रभावित हो, कोई स्पष्ट कारण मिलता ही नहीं। ऐसे में यह किसी का दोष नहीं, बल्कि सिर्फ एक मेडिकल स्थिति है जिससे सही समय पर निपटा जा सकता है।

पहचानें कैसे — किन संकेतों पर ध्यान दें

नवजात या छोटे बच्चे यह नहीं बता सकते कि उन्हें धुंधला दिख रहा है। इसलिए माता-पिता और पीडियाट्रिशियन को कुछ संकेतों पर नजर रखनी होती है:

  • पुतली में सफेदी या धुंधलापन (इसे leukocoria कहते हैं) — फोटो में फ्लैश से आंख लाल की जगह सफेद या धुंधली दिखे तो यह एक बड़ा संकेत है।
  • आंखों का लगातार कांपना या इधर-उधर हिलना (nystagmus) — यह बताता है कि आंख को साफ दृष्टि नहीं मिल रही।
  • भेंगापन (strabismus) — जब एक या दोनों आंखें ठीक से एक दिशा में केंद्रित न हो पाएं।
  • तेज रोशनी से असहज होना (photophobia)
  • बच्चा चीजों या चेहरों पर आंख से नजर न टिका पाना, या आंखों से किसी चीज़ को ट्रैक न कर पाना।

इनमें से कोई भी संकेत दिखे तो तुरंत किसी पीडियाट्रिक ऑप्थेल्मोलॉजिस्ट (बच्चों की आंखों के विशेषज्ञ) से मिलना चाहिए। ज्यादातर मामलों में हालांकि यह किसी रूटीन चेकअप के दौरान ही पकड़ में आ जाता है, क्योंकि शुरुआती दौर में बच्चा खुद कोई शिकायत नहीं दिखाता।

क्या हर जन्मजात मोतियाबिंद में सर्जरी जरूरी है

यहां एक जरूरी बात समझनी चाहिए — हर मोतियाबिंद को हटाने की जरूरत नहीं पड़ती।

अगर मोतियाबिंद लेंस के बिल्कुल किनारे (peripheral) हिस्से में है, तो केंद्रीय दृष्टि (central vision) पर बहुत असर नहीं पड़ता, और ऐसे में डॉक्टर सिर्फ निगरानी की सलाह देते हैं। इसी तरह अगर मोतियाबिंद बहुत ही छोटा है, तो भी उसे तुरंत ऑपरेट करने की जरूरत नहीं समझी जाती।

लेकिन अगर मोतियाबिंद इतना घना है कि वह बच्चे की दृष्टि विकास (visual development) में रुकावट डाल रहा है, तो सर्जरी को टालना समझदारी नहीं है। आंखों का विकास पूरी तरह जीवन के शुरुआती वर्षों में होता है — अगर इस दौरान दिमाग तक साफ तस्वीर नहीं पहुंचती, तो आंख कमजोर पड़ने लगती है, जिसे amblyopia या "आलसी आंख" कहा जाता है। यह स्थिति बड़े होकर ठीक करना कहीं ज्यादा मुश्किल हो जाती है।

सर्जरी की सही उम्र क्यों मायने रखती है

बच्चों की आंख के विशेषज्ञ आमतौर पर मानते हैं कि अगर सर्जरी जरूरी है, तो घने द्विपक्षीय (bilateral) मोतियाबिंद के लिए इसे बच्चे के 6 हफ्ते से 3 महीने की उम्र के बीच कर लेना बेहतर रहता है। कुछ विशेषज्ञ इस खिड़की को थोड़ा और संकरा मानते हुए 4 से 10 हफ्तों के बीच सर्जरी की सलाह देते हैं। जितनी जल्दी साफ रोशनी रेटिना तक पहुंचने लगती है, उतना ही बेहतर मौका बच्चे की आंख को सामान्य विकास का मिलता है।

इसका मतलब यह नहीं कि हर घंटा गिनना है, लेकिन देर करना निश्चित रूप से जोखिम बढ़ाता है। अगर आपके बच्चे को जन्मजात मोतियाबिंद डिटेक्ट हुआ है, तो सर्जरी के समय को लेकर जो भी सवाल या झिझक हो, उसे अपने आंख के सर्जन के साथ खुलकर डिस्कस करें — हर बच्चे का केस थोड़ा अलग हो सकता है।

सर्जरी के बाद: लेंस की जरूरत क्यों पड़ती है

एक बात जो अक्सर लोग नहीं समझ पाते — मोतियाबिंद निकाल देना ही काम खत्म नहीं करता। लेंस हटाने के बाद आंख में फोकस करने की क्षमता नहीं बचती, इसलिए किसी न किसी तरीके से उसकी भरपाई करनी ही पड़ती है — चाहे वह इंट्राओकुलर लेंस (IOL) इम्प्लांट हो, कॉन्टैक्ट लेंस हो, या चश्मा।

बड़ों में सर्जरी के दौरान ज्यादातर सीधे IOL इम्प्लांट कर दिया जाता है। लेकिन बच्चों के मामले में यह उतना सीधा नहीं है। वजह यह है कि बच्चे की आंख अभी बढ़ रही होती है — उसका आकार और पावर लगातार बदलता है। ऐसे में सही पावर का IOL चुनना सर्जन के लिए एक चुनौती बन जाता है, क्योंकि जो पावर आज सही बैठे, वह कुछ सालों बाद गलत साबित हो सकती है।

यही वजह है कि बहुत छोटे शिशुओं में विशेषज्ञ अक्सर शुरुआत में कॉन्टैक्ट लेंस को प्राथमिकता देते हैं, और आंख के पूरी तरह विकसित होने के बाद, कुछ साल बड़े होने पर लेंस इम्प्लांट की सर्जरी अलग से की जाती है। इसके पीछे तर्क यह है कि इससे बार-बार सर्जरी करानी पड़े, ऐसी जटिलताओं का खतरा कम रहता है — हालांकि हर बच्चे के लिए सही रणनीति उसके सर्जन की क्लिनिकल जजमेंट पर निर्भर करती है।

यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि सर्जरी के बाद अगर सही दृष्टि सुधार (चाहे लेंस हो या चश्मा) न मिले, तो आंख का विकास वैसे भी अधूरा रह सकता है — इसलिए सर्जरी के बाद फॉलो-अप उतना ही जरूरी है जितना सर्जरी खुद।

सर्जरी के बाद किन बातों पर नजर रखनी चाहिए

पेरेंट्स के लिए यह जानना जरूरी है कि सर्जरी के बाद भी निगरानी लंबे समय तक चलती है:

  • पोस्टीरियर कैप्सूल ओपेसिफिकेशन — यह एक आम जटिलता है जिसमें सर्जरी के बाद फिर से धुंधलापन लौट सकता है, इसका इलाज आमतौर पर सीधा होता है।
  • ग्लूकोमा का खतरा — जन्मजात मोतियाबिंद की सर्जरी के बाद आंख में दबाव बढ़ने (ग्लूकोमा) का जोखिम बना रहता है, इसीलिए नियमित आंख की जांच वर्षों तक जरूरी रहती है।
  • एम्ब्लायोपिया (आलसी आंख) की थेरेपी — कई बार पैचिंग या विजन थेरेपी की जरूरत पड़ती है ताकि दोनों आंखें मिलकर सही तरीके से काम करना सीखें।

इसीलिए एक बार सर्जरी हो जाने के बाद भी, नियमित चेकअप का सिलसिला रोकना नहीं चाहिए।

पेरेंट्स के लिए एक जरूरी बात

अगर आपको अभी-अभी पता चला है कि आपके नवजात या छोटे बच्चे को जन्मजात मोतियाबिंद है, तो घबराहट होना बिल्कुल स्वाभाविक है। लेकिन अच्छी खबर यह है कि आज की मेडिकल तकनीक और अनुभवी पीडियाट्रिक आई सर्जन्स की मदद से इसका इलाज बेहद सफल दर से किया जा रहा है। समय पर पहचान, सही उम्र में सर्जरी, और सर्जरी के बाद अनुशासित फॉलो-अप — इन तीन चीजों का साथ मिलते ही बच्चे की आंखों का विकास लगभग सामान्य बच्चों जैसा हो सकता है।

अगर आपके परिवार में मोतियाबिंद या किसी जेनेटिक आंख की बीमारी का इतिहास रहा है, तो अपने बच्चे के जन्म के तुरंत बाद ही आंखों की स्क्रीनिंग जरूर करवाएं, और उसके बाद भी नियमित चेकअप का शेड्यूल फॉलो करें।

निष्कर्ष

जन्मजात मोतियाबिंद सुनने में जितना डरावना लगता है, समय पर पहचान लिए जाने पर उतना ही मैनेज करने योग्य भी है। जरूरत बस इस बात की है कि माता-पिता शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज न करें, नवजात की आंखों की जांच को हल्के में न लें, और अगर डॉक्टर सर्जरी की सलाह दें तो सही समय पर फैसला लें। बच्चे की आंखों का पूरा भविष्य अक्सर उन शुरुआती कुछ हफ्तों और महीनों में लिए गए फैसलों पर टिका होता है।

नोट: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है और यह किसी योग्य पीडियाट्रिक ऑप्थेल्मोलॉजिस्ट की सलाह का विकल्प नहीं है। अपने बच्चे की आंखों से जुड़ी किसी भी चिंता के लिए हमेशा विशेषज्ञ डॉक्टर से सलाह लें।